प्रार्थना के चार महत्वपूर्ण भाग

हम में से अधिकांश लोग प्रार्थना करना चाहते हैं, परन्तु हमारी प्रार्थनाओं में प्रायः दिशा व क्रमबद्धता की कमी पाई जाती है, क्योंकि हम भूल जाते हैं कि हम कैसे प्रार्थना करें। इसलिए, इस लेख में पाए जाने वाले चार भाग क्रमबद्ध रीति से प्रार्थना करने में हमारी सहायता करेंगे।

1. स्तुति करना

“हे सारी पृथ्वी के लोगो, परमेश्वर का जयजयकार करो; उसके नाम की महिमा का भजन गाओ, स्तुति करते हुए उसकी महिमा करो। परमेश्वर से कहो, ‘तेरे कार्य कैसे भयानक हैं’” (भजन 66:1-3)।

परमेश्वर की प्रशंसा करने का तात्पर्य- परमेश्वर से यह कहना है कि आप अद्भुत परमेश्वर हैं। भजन 66:1-3 में, भजनकार परमेश्वर की स्तुति और प्रशंसा करने के लिए हमें उत्साहित करते हुए कहता है, कि परमेश्वर के अस्तित्व, उसके गुणों और कार्यों के लिए हम अपने मुंह खोलकर प्रशंसा करें। हम स्मरण करें कि प्रभु जी सम्प्रभु हैं। वही एकमात्र सृष्टिकर्ता, सामर्थी, प्रेमी, धर्मी न्यायी और पवित्र परमेश्वर हैं। परमेश्वर के इन महान गुणों को ध्यान में रखते हुए हम उसकी स्तुति और आराधना कर सकते हैं। परमेश्वर की महानता के लिए उसकी सराहना करें। बाइबल के कई खण्डों का उपयोग परमेश्वर की स्तुति करने लिए कर सकते हैं। जैसे – व्यवस्थाविवरण 32:3-4; 1 इतिहास 29:10-11; प्रकाशितवाक्य 4:11 आदि।

यीशु मसीह ने जब अपने शिष्यों को प्रार्थना करना सिखाया तो उस प्रार्थना का आरम्भ ही परमेश्वर की प्रशंसा करने से किया- “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है, तेरा नाम पवित्र माना जाए” (मत्ती 6:9)। भजनकार और हमारे प्रभु यीशु मसीह दोनों सिखाते हैं कि हमारी प्रार्थनाओं का आरम्भ परमेश्वर की स्तुति करने से होना चाहिए।

2. अंगीकार करना

“यदि हम अपने पापों को मान लें तो वह हमारे पापों को शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है”(1यूहन्ना 1:9)।

अंगीकार करने का तात्पर्य – मानने, स्वीकार करने, विश्वास करने से है। हम अपनी प्रार्थनाओं में स्वीकार करते हैं कि प्रभु जी आप पवित्र हैं। इसके आधार पर हम अपने पापों और अपराधों का अंगीकार करते हैं। जब हम परमेश्वर के गुणों और कार्यों के आधार पर उसकी स्तुति करते हैं, तो हम उसके स्तर को देखते हैं। जब हम उसके स्तर के आधार पर अपने हृदय, मन, विचार, कर्मों को मूल्यांकित करते हैं, तब  हम अपने पापों के प्रति कायल किए जाते हैं। जितना अधिक हम उसकी पवित्रता पर मनन करते हैं, उतना ही अधिक हमारी अपवित्रता और दुष्टता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। परमेश्वर के सम्मुख अपनी अपवित्रता का बोध हमें पापों के अंगीकार की ओर ले जाता है।

अपनी प्रार्थनाओं में परमेश्वर के गुणों और स्वभाव की बड़ाई करने के साथ-साथ हम अपनी निर्बलता और पापमय स्थिति को देखकर प्रभु के सामने नतमस्तक होते हैं। अपने पापों का अंगीकार करते और प्रभु से क्षमा मांगते हैं। क्योंकि हमारे पास यह आश्वासन है कि परमेश्वर हमारे पापों को क्षमा करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है (1यूहन्ना 1:9)। भजन 51 में राजा दाऊद अपने पापों से अंगीकार की प्रार्थना करता है। उसकी प्रार्थना हमारे लिए एक अच्छा उदाहरण है, जिसका अनुकरण हम लोग भी कर सकते हैं। 

3. धन्यवाद देना

“मैं गीत गाकर परमेश्वर के नाम की स्तुति करूँगा, और धन्यवाद देकर उसकी बड़ाई करूँगा”(भजन 69:30)।

धन्यवाद देने का तात्पर्य – परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता को व्यक्त करना है या अपने शब्दों में कहना कि आप किन बातों के लिए धन्यवादी हैं। यह हमारी प्रार्थनाओं का तीसरा प्रमुख भाग है। इस भाग में हम केवल परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों के आधार पर, उसके प्रावधानों के आधार पर – चाहे वह आत्मिक रूप से हो या भौतिक रूप से हो, परमेश्वर का धन्यवाद देते हैं। क्योंकि परमेश्वर को धन्यवाद देना परमेश्वर के प्रति कृतज्ञता या आभार को व्यक्त करना है। एक नम्र व्यक्ति का हृदय, जिसने परमेश्वर की भलाई और करुणा तथा परमेश्वर प्रदत्त उद्धार का स्वाद चख लिया है, उसका हृदय कृतज्ञता से भरपूर होगा। उसके हृदय रूपी झरने से धन्यवाद रूपी जल प्रवाहित होगा। परमेश्वर की महिमा के लिए उसके मुंह से सदैव धन्यवाद के शब्द निकलेंगे।

एक नम्र व्यक्ति का हृदय, जिसने परमेश्वर की भलाई और करुणा तथा परमेश्वर प्रदत्त उद्धार का स्वाद चख लिया है, उसका हृदय कृतज्ञता से भरपूर होगा। उसके हृदय रूपी झरने से धन्यवाद रूपी जल प्रवाहित होगा।

“हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह, और जो कुछ मुझ में है, उसके पवित्र नाम को धन्य कहे! हे मेरे मन, यहोवा को धन्य कह, और उसके किसी भी उपकार को न भूल”(भजन 103:1-2)।  इन दो पदों के आधार पर मैं आप को उत्साहित करना चाहूँगा कि अपनी व्यक्तिगत प्रार्थओं में और सामूहिक कलीसियाई आराधना में  परमेश्वर को अवश्य ही धन्यवाद दें, उसके उपकारों को स्मरण रखते हुए धन्यवाद के साथ उसकी आराधना करें।

4. विनती करना

“किसी भी बात की चिन्ता न करो, परन्तु प्रत्येक बात में प्रार्थना और निवेदन के द्वारा तुम्हारी विनती धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख प्रस्तुत की जाए” (फिलिप्पियों 4:6)।

प्रार्थना का अन्तिम और चौथा भाग विनती या याचना करना है। इस भाग में हम परमेश्वर से अपनी आत्मिक और भौतिक आवश्यकताओं को प्रभु के सम्मुख रखते हैं। हम परमेश्वर के भले प्रावधान की मांग करते हैं। क्योंकि परमेश्वर पिता को यह भाता है कि उसकी सन्तानें अपने स्वर्गिक पिता पर प्रत्येक बात के लिए निर्भर रहें। उससे अपनी आत्मिक व भौतिक आवश्यकताओं के लिए विनती करें। इसीलिए, प्रेरित पौलुस भी हम विश्वासियों को उत्साहित करना चाहता है कि हम किसी भी बात के लिए चिन्ता न करें, परन्तु परमेश्वर के सम्प्रभु प्रावधान पर भरोसा रखते हुए विनती व प्रार्थना करें।

हम विश्वासियों को प्रत्येक बातों में परमेश्वर पर निर्भर रहना चाहिए, चाहे वे बातें आत्मिक हों या फिर भौतिक हों। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने स्वयं हमारे लिए परमेश्वर पिता से विनती करने का एक आदर्श प्रस्तुत किया है। उन्होंने पिता से विनती की, कि “हमारे दिन भर की रोटी आज हमें दे”(मत्ती 6:10)। इसलिए आइए हम अपने सर्वश्रेष्ठ आदर्श प्रभु यीशु मसीह का अनुसरण करते हुए प्रत्येक बातों के लिए परमेश्वर पिता से विनती करें और परमेश्वर पर निर्भर रहे हैं।

प्रिय भाईयो-बहनो! मैंने अपने प्रार्थना के जीवन में तथा सामूहिक कलीसियाई आराधना में क्रमबद्ध प्रार्थना के इन चार भागों को अत्यधिक सहायक पाया है। मैं आपको भी उत्साहित करना चाहूँगा कि अपनी व्यक्तिगत और कलीसियाई प्रार्थना में इन चार भागों को ध्यान रखें और प्रार्थना करें। ऐसा करने के द्वारा हमारी प्रार्थनाएं और अधिक बाइबलीय व अर्थपूर्ण, क्रमबद्ध और परमेश्वर को महिमा प्रदान करने वाली होंगी।

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