आपके मन में एक अस्पष्ट, दोष बोध होना कि आप घटिया व्यक्ति हैं तथा पाप के प्रति कायल होना, दोनों बातें एक ही समान नहीं हैं। भीतर से सड़ाहट का आभास करना और पश्चाताप करना, दोनों एक जैसे नहीं हैं। 

आज की सुबह मैंने प्रार्थना करना आरम्भ किया, और ब्रह्माण्ड के सृष्टिकर्ता से बात करने में अयोग्य महसूस किया। यह अयोग्यता का एक अस्पष्ट आभास था। इसलिए मैंने उसको ऐसा बता दिया। तो अब क्या करें?

जब तक मैंने अपने पापों के विषय में विशिष्ट होना आरम्भ नहीं किया तब तक कुछ भी परिवर्तित नहीं हुआ। स्वयं के बारे में घटिया आभास करना उपयोगी हो सकता है यदि वह  विशिष्ट पापों के प्रति कायल होने में सहायता करता है। परन्तु मन में अस्पष्ट, दोष बोध की भावनाएं सामान्यतः बहुत सहायक नहीं होती हैं। 

अयोग्यता के कोहरे को अनाज्ञाकारिता के स्पष्ट काले खम्भों का आकार लेने की आवश्यकता है। तब आप उनकी ओर संकेत कर सकते हैं और पश्चात्ताप कर सकते हैं और क्षमा मांग सकते हैं तथा उन्हें अपनी सुसमाचार की तोप द्वारा ध्वस्त कर सकते हैं।  

इसलिए मैंने उन आज्ञाओं के विषय में सोचना आरम्भ किया जिन्हें मैं प्राय: तोड़ता हूँ। ये वे आज्ञाएं हैं जो मुझे स्मरण आईं।

  • तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे हृदय और अपने सारे प्राण और सारी बुद्धि से प्रेम कर। 95 % नहीं, परन्तु 100% (मत्ती 22:37)
  • तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम कर। उसके साथ सब कुछ भला हो इस बात के लिए उतने ही उत्सुक हों, जितना कि आप स्वयं के साथ भला होने के लिए उत्सुक रहते हैं। (मत्ती 22:39)
  • सब काम बिना कुड़कुड़ाए करो। कुछ भी कुड़कुड़ाहट नहीं — न ही भीतर और न ही बाहर (फिलिप्पियों 2:14)
  • अपनी समस्त चिन्ता उसी पर डाल दो —  ताकि तुम अब उनके द्वारा बोझ तले न दब जाओ। (1 पतरस 5:7)
  • केवल ऐसी बातें कहो जिससे सुनने वालों पर अनुग्रह हो — विशेषकर उन पर जो तुम्हारे निकट हों। (इफिसियों 4:29)
  • समय का पूरा पूरा उपयोग करो। एक भी मिनट को व्यर्थ में न जाने दो, या गंवाओ। (इफिसियों 5:16)

महान पवित्रता का दिखावा करने का कोई भी प्रयास नहीं चलेगा! मेरा भेद खुल गया है।    

यह अस्पष्ट, घटिया विचारों से कहीं अधिक निकृष्ट है। ओह! परन्तु अब शत्रु प्रत्यक्ष है। पाप स्पष्टता से दिखाई दे रहे हैं। वे छुपने के स्थान से बाहर आए गए हैं। मैं उनकी आँखों में आँख डालकर देख रहा हूँ। मैं घटिया विचारों के बारें में पिनपिना नहीं रहा हूँ। मैं मसीह से उन विशिष्ट बातों को न करने के लिए क्षमा मांग रहा हूँ, जिनकी आज्ञा उसने दी है।

मैं टूटा हुआ हूँ, और मैं अपने पाप पर क्रोधित हूँ। मैं इसका  घात करना चाहता हूँ, स्वयं  को नहीं। मैं आत्मघाती नहीं हूँ। मैं पाप से घृणा करने वाला और पाप का घात करने वाला हूँ। (“अपनी पार्थिव देह के अंगों को मृतक समझो,” कुलुस्सियों 3:5; “शरीर के कार्यों को नष्ट करो,” रोमियों 8:13।) मैं जीना चाहता हूँ। इस कारण मैं अपने पाप का — हत्यारा हूँ!

इस संघर्ष में, मैं प्रतिज्ञा को सुनता हूँ, “यदि हम अपने पापों को मान लें तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (1 यूहन्ना 1:9)। मैं अपने भीतर बढ़ती हुई शान्ति की अनुभूति करता हूँ।

अब, प्रार्थना पुनः सम्भव और सही तथा सामर्थी प्रतीत होती है।

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