एक विश्वासी का धन के प्रति सही प्रतिउत्तर

धन एक ऐसा साधन है, जिसके द्वारा आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त किया जाता है। वर्तमान समय में धन लोगों के जीवन में एक महत्वपूर्ण साधन है। संसार के दृष्टिकोण से धन सर्वोच्च स्थान पर है। संसार सोचता है कि – यदि आप के पास धन है, तो आप के पास सब कुछ है। यदि आप के पास रुपया है, तो आप के पास सुरक्षित भविष्य, बेहतर स्वास्थ्य व सुख -सुविधाएं होंगी, अच्छे मित्र होंगे। संसार की दृष्टि में धन सबसे बड़े ईश्वर की भाँति है। संसार के लोग सोचते हैं कि धन मेरा है, मैंने कमाया है, तो मैं ही इसका सुख-विलास करूँगा। इसलिए हमारे समाज में एक कहावत प्रचलित है कि “न बाप बड़ा न भईया, सबसे बड़ा है रुपय्या।”

परन्तु रुपये व धन के प्रति बाइबलीय दृष्टिकोण इस सोच से बिल्कुल भिन्न है। तो आइए हम जानें कि धन व रुपये के प्रति बाइबलीय दृष्टिकोण क्या है और एक विश्वासी का धन के प्रति क्या प्रतिउत्तर होना चाहिए। 

बाइबल का मसीही और धन के प्रति दृष्टिकोण:

धन के प्रति मसीही दृष्टिकोण संसार के दृष्टिकोण के सदृश नहीं है। मसीही दृष्टिकोण के अनुसार धन या रुपया बड़ा नहीं है। मसीहियों के लिए धन ऐसा साधन है, जो दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। मसीहियों के लिए धन परिवार की आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, कलीसिया में दूसरों की सहायता करने के लिए, और सुसमाचार के कार्य की बढ़ोत्तरी हेतु देने के लिए है।

हम मसीही लोग परमेश्वर के भण्डारी होने के नाते अपने धन पर घमण्ड नहीं कर सकते हैं, केवल अपने ऊपर ही नहीं खर्च कर सकते हैं। क्योंकि जो कुछ भी हमारे पास है, वह सब कुछ परमेश्वर का दिया हुआ दान है। 

मसीही दृष्टिकोण के अनुसार धन अपने आप में बुरा नहीं है, परन्तु धन अच्छी वस्तु है, इसमें कोई बुराई नहीं पाई जाती है, समस्या केवल हमारे हृदय में धन के प्रति लोभ में है। इसलिए हम मसीहियों को धन के लोभ से बहुत सावधान रहना चाहिए। हमारे जीवन को धन न संचालित करे, परन्तु मसीही लोग धन को संचालित करें। दूसरे शब्दों में – धन हमारे ऊपर प्रभुता न करने पाए, परन्तु हम धन पर प्रभुता करें। 

हम मसीहियों को धन कमाने के लिए परिश्रम करना चाहिए, हमें आलसी नहीं होना चाहिए क्योंकि “जिसके हाथ ढ़िलाई के साथ काम करते हैं, वह कंगाल हो जाता है, परन्तु परिश्रमी के हाथ उसे धनी बना देते हैं” (नीतिवचन 10:4)। धन कमाना और धनी होना कोई बुरी बात नहीं है, परन्तु महत्वपूर्ण यह है कि धन के प्रति हमारा प्रतिउत्तर कैसा है?

हम मसीहियों को यह स्मरण रखने की आवश्यकता है कि बाइबल मसीही जीवन और धन के बारे में क्या कहती है। हमें उसी के अनुसार व्यवहार व आचरण करने की आवश्यकता है। यद्यपि धन कमाना और धनी होना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन हम मसीहियों का धन के प्रति बाइबल पर आधारित सही दृष्टिकोण होना चाहिए। तो आइए हम जानें कि बाइबल मसीही और धन के बारे में क्या निर्देश देती है।

1. धन के लोभ से मुक्त सन्तुष्टिपूर्ण जीवन जीने की मांग :

परमेश्वर का वचन बाइबल मसीही जीवन में सन्तुष्टि की मांग करती है। जब हम अपने जीवन में सन्तुष्ट नहीं होते हैं, तो हमारे लिए भौतिक वस्तुओं में, धन सम्पत्ति में सन्तुष्टि पाने की खोज में लग जाने के अधिक अवसर होते हैं। कई बार हम जीवन में समझौता करने के लिए तैयार हो जाते हैं। लेकिन बाइबल हम विश्वासियों से मांग करती है कि जो कुछ हमारे पास है उसी में सन्तुष्ट रहें। हमारे लिए रुपया या धन सबसे बड़ी कमाई नहीं होना चाहिए, परन्तु सबसे बड़ी कमाई सन्तोष सहित भक्ति होनी चाहिए। क्योंकि परमेश्वर का वचन हमें बताता है कि “… सन्तोष सहित भक्ति वास्तव में महान कमाई है। क्योंकि न तो हम संसार में कुछ लाए हैं, न यहां से कुछ ले जाएंगे। यदि हमारे पास भोजन और वस्त्र हैं, तो उन्हीं से हम सन्तुष्ट रहेंगे” (1तीमुथियुस 6:6-8)। 

हम मसीही लोगों को धन को कमाने के लिए पागल नहीं होना चाहिए, क्योंकि धन कमाने का पागलपन कई बार हमें प्रभु और स्थानीय कलीसिया से दूर ले जाता है। धन का लोभ और उसकी चाहना दोनों हमारी आत्मिक उन्नति के बजाय हमें विनाश की गर्त में ढकेल देते हैं। इसलिए परमेश्वर का वचन हमें स्पष्ट निर्देश देते हुए कहता है कि “परन्तु जो धनवान होना चाहते हैं, वे प्रलोभन, फन्दे में, और अनेक मूर्खतापूर्ण और हानिकारक लालसाओं में पड़ जाते हैं जो मनुष्य को पतन तथा विनाश के गर्त में गिरा देती हैं। क्योंकि धन का लोभ सब प्रकार की बुराईयों की जड़ है। कुछ लोगों ने इसकी लालसा में विश्वास से भटक कर अपने आप को अनेक दुखों से छलनी बना डाला है”( 1तीमुथियुस 6:9-10)।

2. धन पर भरोसा रखने के बजाय परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखने की मांग

हम विश्वासियों को अपनी सुरक्षा धन में नहीं खोजना चाहिए। इसके बजाय हमें परमेश्वर और उसके वचन व प्रतिज्ञाओं पर भरोसा रखना चाहिए। मनुष्य का जीवन उसकी कमाई पर या उसकी धन सम्पत्ति पर निर्भर नहीं करता है। परन्तु प्रभु ही हमें कार्य करने, जीविका अर्जित करने की सामर्थ्य और जीवन प्रदान करता है। प्रभु यीशु मसीह स्वयं धनी मूर्ख का दृष्टान्त देते हुए सिखाते हैं कि “सावधान, हर प्रकार के लोभ से सतर्क रहो, क्योंकि सम्पत्ति की अधिकता होने पर भी किसी का जीवन उसकी सम्पत्ति पर निर्भर नहीं होता” (लूका 12:15)।

इसलिए हमें धन-सम्पत्ति व रुपये पर भरोसा रखने की अपेक्षा परमेश्वर और उसकी प्रतिज्ञाओं पर निर्भर रहना चाहिए। परमेश्वर का वचन बाइबल हमें बताती है – “तुम्हारा जीवन धन लोलुपता से मुक्त हो, जो तुम्हारे पास है उसी में सन्तुष्ट रहो, क्योंकि उसने स्वयं कहा है, मैं तुझे कभी न छोडूंगा और न कभी त्यागूँगा”( इब्रानियों 13:5)।जब हम परमेश्वर पर और उसकी प्रतिज्ञाओं पर निर्भर रहते हैं, तो यह यह हमारी सहायता करता है कि हम धन के लोभ से दूर रह सकें और जो कुछ हमारे पास है उसमें सन्तुष्ट रहें।

जब हम परमेश्वर पर और उसकी प्रतिज्ञाओं पर निर्भर रहते हैं, तो यह हमारी सहायता करता है कि हम धन के लोभ से दूर रह सकें और जो कुछ हमारे पास है उसमें सन्तुष्ट रहें।

3. धन की सेवा छोड़कर  केवल यीशु की सेवा करने की मांग

परमेश्वर का वचन यह नहीं कहता है कि तुम धन न कमाओ और मेहनत न करो। परन्तु परमेश्वर का वचन यह बताता है कि हम एक स्वामी की सेवा करने के लिए बुलाए गए हैं, न कि दो स्वामी (धन और मसीह) की। कई बार हमारे सामने एक बड़ा प्रलोभन हो सकता है कि हम धन के पीछे भी भागें और मसीह के पीछे चलते और सेवा करते रहें। इसलिए हम विश्वासियों को बहुत ही सावधान रहना चाहिए कि कहीं हम दो स्वामियों (धन और मसीह) की सेवा करने का प्रयास तो नहीं कर रहे हैं। प्रभु यीशु मसीह ने सन्दर्भ में सिखाया कि “क्योंकि जहां तेरा धन है, वहां तेरा मन भी लगा रहेगा।” “कोई भी व्यक्ति दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा, या एक से घनिष्टता रखेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा। तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते”( मत्ती 6:21, 24)। हम मसीहियों को प्रभु की सेवा करने के लिए बुलाया गया है, हमें प्रभु व सुसमाचार हेतु जीवन जीने के लिए बुलाया गया है।

प्रिय भाई बहनों, धन के लिए अपने आत्मिक जीवन से समझौता न करें – कई बार हम अपनी नौकरी, पदोन्नत्ति, अच्छे वेतन व सुविधाओं के लिए अपनी स्थानीय कलीसिया को छोड़कर ऐसे नगर व स्थान पर चले जाते हैं, जहां पर सुसमाचार केन्द्रित व बाइबल पर आधारित कलीसियाएं नहीं होती हैं जिसका हम एक भाग बन सके। ऐसी स्थिति में हमें आत्मिक जीवन व कलीसियाई प्राथमिकता से समझौता नहीं करना चाहिए। धन हमें बहुत शीघ्र प्रभु से दूर ले जा सकता है, इसलिए धन पर भरोसा व आशा न रखें। जो कुछ हमारे पास है, उस में हमें सन्तुष्ट रहें । यदि आप के पास धन है तो अपने धन का उपयोग सुसमाचार के कार्य में उपयोग करें।

हम विश्वासियों को परमेश्वर का वचन निर्देश देता है कि हम अपने धन को भले कार्यों में लगाएं और दानशील बने और उदारता दिखाएं क्योंकि परमेश्वर का वचन हमें सिखाता है कि “जो इस वर्तमान संसार में धनवान हैं, वे अहंकारी न बनें और वे अनिश्चित धन पर नहीं, परन्तु परमेश्वर पर आशा रखें, भले कार्य करें, भले कार्यों में धनी बनें, दानशील और उदार हों क्योंकि परमेश्वर हमारे सुख के लिए सब कुछ बहुतायत से देता है।” (1तीमुथियुस 6:17-18)।

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