“कड़वाहट की जड़” क्या है?

“कड़वाहट” प्रायः क्रोध और द्वेष से सम्बन्ध रखती है। परन्तु क्या इब्रानियों 12:15 में इसका यही अर्थ है: “ध्यान रखो कि कोई परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित न रह जाए, या कोई कड़वी जड़  फूटकर कष्ट का कारण न बने, जिससे कि बहुत से लोग अशुद्ध हो जाएं”? मुझे ऐसा नहीं प्रतीत होता है।

आइए हम कुछ प्रश्नों को पूछें। सबसे पहले, क्या “कड़वाहट की  जड़” का अर्थ है कि जड़ कड़वी है (लकड़ी के टुकड़े के समान)? अथवा क्या इसका अर्थ यह है कि जड़ बड़ी होकर एक पौधा बन जाती है और कड़वे फल को उत्पन्न करती है? दूसरा, क्या इब्रानियों 12:15 में “कड़वाहट” का अर्थ “सड़ता हुआ क्रोध” है, या फिर इसका अर्थ “विषैला और गंदा” होना है? तीसरा, “कड़वाहट की जड़” का यह चित्र कहाँ से आया है?

आइए हम अन्तिम प्रश्न के साथ आरम्भ करें। उत्तर: यह व्यवस्थाविवरण 29:18 से आया है।

कहीं ऐसा न हो कि तुम में कोई ऐसा पुरुष या स्त्री हो, अथवा परिवार या गोत्र हो जिसका मन आज हमारे परमेश्वर यहोवा से फिर जाए और वह जाकर उन जातियों के देवताओं की उपासना करे, और ऐसा न हो कि तुम्हारे मध्य कोई ऐसी जड़ हो जो विषैला फल तथा नागदौना उत्पन्न करे।

यह पृष्ठभूमि हमें पहले के दो प्रश्नों का उत्तर देने में भी सहायता करती है: जड़ स्वयं में कड़वाहट नहीं है वरन् कड़वाहट का फल उत्पन्न करती है। और जो कड़वाहट यह उत्पन्न करती है वह विषैली है। यह कड़वा फल, सड़ता हुआ क्रोध हो सकता  है या यह कुछ और हो सकता है। यहाँ मुख्य बात यह है कि यह घातक है।

मुख्य प्रश्न यह है: यह कौन सी जड़ है जो कलीसिया में घातक, कड़वे फल को उगाने का कारण बनती है? व्यवस्थाविवरण 29 में अगला पद आश्चर्यजनक उत्तर देता है, परन्तु यह इब्रानियों की पुस्तक के साथ पूरी तरह से उपयुक्त बैठता है। व्यवस्थाविवरण 29:18 इस प्रकार समाप्त होता है, “और ऐसा न हो कि तुम्हारे मध्य कोई ऐसी जड़ हो जो विषैला फल तथा नागदौना उत्पन्न करे।” फिर पद 19 इस जड़ को परिभाषित करते हुए आरम्भ होता है:

… जब ऐसा मनुष्य शाप के इन वचनों को सुनेगा तो अपने हृदय में यह सोचकर अपने आप को धन्य समझेगा, कि यद्यपि मैं मन की ढिठाई के अनुसार चलूँ फिर भी शान्ति बनी रहेगी।  ऐसा विचार सिंचित तथा सूखी भूमि दोनों को नाश करने वाला है।

तो फिर वह कौन सी जड़ है जो कड़वे फल को उत्पन्न करती है? यह एक ऐसा व्यक्ति है जो अनन्त सुरक्षा के विषय मे त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण रखता है। वह सुरक्षा का आभास करता है जब कि वह सुरक्षित नहीं है। वह कहता है, “मैं मन की ढिठाई के अनुसार चलूं फिर भी शान्ति [सुरक्षा] बनी रहेगी।” वह परमेश्वर की वाचा का त्रुटिपूर्ण ढंग से अर्थ निकालता है। वह सोचता है क्योंकि वह वाचा के लोगों में सहभागी है, इसलिए वह परमेश्वर के न्याय से सुरक्षित है।

इस प्रकार के दुस्साहस को इब्रानियों की पत्री बार-बार सम्बोधित करती है — विश्वास का अंगीकार करने वाले मसीही सोचते हैं कि वे पिछले कुछ आत्मिक अनुभव या वर्तमान में मसीही लोगों के साथ सम्बन्धित होने के कारण सुरक्षित हैं। इब्रानियों का उद्देश्य मसीहियों के दुस्साहस का उपचार करना, तथा विश्वास और पवित्रता में सच्ची दृढ़ता को उत्पन्न करना है। यह पत्री कम से कम चार बार चेतावनी देती है कि हमें अपने महान उद्धार की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, परन्तु विश्वास की लड़ाई लड़ने के लिए हमें प्रतिदिन सतर्क रहना चाहिए, ऐसा न हो कि हम कठोर हो जाएं और भटक जाएं और यह प्रमाणित करें कि मसीह में हमारी कोई भागीदारी नहीं थी (इब्रानियों 2:3; 3:12–14; 6:4–7; 10:23–29)।

यह इब्रानियों 12:15 में “कड़वाहट की जड़” वाक्यांश के सन्दर्भ की भी मुख्य बात है।

सब मनुष्यों के साथ मेल मिलाप रखो, और उस पवित्रता के खोजी बनो, जिसके बिना प्रभु को कोई भी नहीं देख पाएगा। ध्यान रखो कि कोई परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित न रह जाए, या कोई “कड़वी जड़ ” फूटकर कष्ट का कारण न बने, जिससे कि बहुत से लोग अशुद्ध हो जाएं (12:14-15)।

यह एक चेतावनी है कि पवित्रता को हल्के में न लें अथवा यह मानकर चलें कि और अधिक अनुग्रह प्राप्त होगा।

इसलिए “कड़वाहट की जड़” कलीसिया में ऐसा व्यक्ति या ऐसा सिद्धांत है जो लोगों को दुस्साहस से कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है और उद्धार को एक स्वचलित वस्तु के जैसा समझता है, जिसमें विश्वास की लड़ाई और पवित्रता की खोज में सतर्कता का जीवन जीने की आवश्यकता नहीं है। ऐसा व्यक्ति या सिद्धान्त बहुतों को अशुद्ध करता है और एसाव के जैसे अनुभव की ओर ले जा सकता है जिसने अपने उत्तराधिकार को उतावलेपन तथा छल के कारण खो दिया और अन्त में पश्चात्ताप नहीं कर सका और न जीवन पा सका।

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