यीशु की मृत्यु पापों को उठाती है। यह मसीहियत का मुख्य केन्द्र है, और सुसमाचार का केन्द्र है, और संसार में परमेश्वर के उद्धार के महान कार्य का केन्द्र है। जब मसीह मरा तो उसने पापों को उठा लिया। उसने स्वयं के पापों को नहीं उठाया। उसने उन पापों के लिए दुख उठाया जो दूसरों ने किए थे, ताकि वे   पापों से मुक्त हो सकें।

यह आपके जीवन की सबसे बड़ी समस्या का उत्तर है, भले ही आप इसे मुख्य समस्या के रूप में अनुभव करें या न करें। इस प्रश्न का भी उत्तर है कि पापी होने के पश्चात हम परमेश्वर के समक्ष कैसे सही हो सकते हैं। इसका उत्तर यह है कि मसीह की मृत्यु “बहुतों के पापों को उठाने के लिए” एक बलिदान है। उसने हमारे पापों को उठाया और उन्हें क्रूस पर ले गया और वहां उस मृत्यु को सहा जिसके हम योग्य थे।

अब मेरे मरने के सम्बन्ध में इसका क्या अर्थ है? “[मेरे लिए] एक ही बार मरना नियुक्त किया गया है।” इसका अर्थ यह है कि मेरी मृत्यु अब दण्डात्मक  नहीं रही। मेरी मृत्यु अब पाप के कारण दण्ड  नहीं है। मेरे पाप को उठा लिया गया है। मसीह की मृत्यु के द्वारा मेरा पाप “हटा दिया” गया है। मसीह ने दण्ड ले लिया है।

तो अन्ततः मैं क्यों मरता हूँ? क्योंकि यह परमेश्वर की इच्छा है कि अभी के लिए मृत्यु संसार में बनी रहे, यहाँ तक कि उसके स्वयं के बच्चों के मध्य में भी, पाप की अत्यन्तभयानकता की स्थायी साक्षी के रूप में। हमारी मृत्यु में हम अभी भी पाप के बाहरी प्रभावों को संसार में प्रकट करते हैं।

परन्तु मृत्यु अब परमेश्वर के बच्चों के लिए उनके विरुद्ध उसका प्रकोप नहीं है। यह उद्धार में हमारा प्रवेश द्वार बन गई है न कि दण्डाज्ञा में।

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