हमें बाइबल क्यों पढ़ना चाहिए?

“हमें बाइबल क्यों पढ़नी चाहिए?” यह बहुत ही व्यवहारिक प्रश्न है और इसके बारे में लोगों के अलग-अलग उत्तर हो सकते हैं। बाइबल, हमारा आत्मिक भोजन है जिसे हमें प्रतिदिन ग्रहण करना चाहिए। कुछ लोग इसे एक जादुई पुस्तक के समान पढ़ते हैं, कुछ लोग इसे केवल इसलिए पढ़ते हैं ताकि पास्टर पूछे तो बता दे कि बाइबल पढ़ रहे हैं। परन्तु बाइबल हमें वचन का उपयोग करने के बारे में इस तरह से नहीं सिखाती है। इस लेख में हम पाँच मुख्य कारणों को देखेंगे जो यह बताएंगे कि हमें बाइबल क्यों पढ़नी चाहिए।

बाइबल, हमारा आत्मिक भोजन है जिसे हमें प्रतिदिन ग्रहण करना चाहिए।

  1. उद्धार के सुसमाचार को समझने के लिए।

बाइबल पढ़ने का प्रमुख कारण यह है कि हम उद्धार के सुसमाचार को समझें। सुसमाचार पर विश्वास करने के द्वारा ही मनुष्य का उद्धार होता है। सुसमाचार यह है कि परमेश्वर ने मनुष्य को आज्ञाकारी एवं प्रेम पूर्ण संगति में जीवन जीने के लिए बनाया है। परमेश्वर से विद्रोह करके मनुष्य ने पाप किया जिस कारण मनुष्य पर परमेश्वर का भयंकर दण्ड, अनन्तकाल की मृत्यु का आना निश्चित था। परन्तु लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व परमेश्वर ने प्रेम में होकर अपने पुत्र यीशु मसीह को संसार में भेजा। उसने इस बुरे-समाचार को अच्छे समाचार अर्थात सु-समाचार में बदल दिया। उसने (यीशु) मनुष्य होकर एक सिद्ध जीवन जीया और हमारे पापों के कारण, परमेश्वर के भड़के क्रोध को क्रूस पर अपनी मृत्यु के द्वारा शान्त किया। उसने हमारे पाप की कीमत को चुका दिया और यह बात उसके तीन दिन के बाद जी उठने से प्रमाणित हुई।

सम्पूर्ण बाइबल इसी सुसमाचार को सिखाती है। पुराना नियम, यीशु मसीह के बलिदान की आवश्यकता को दिखाता है कि हमें एक सिद्ध एवं स्थायी बलिदान की आवश्यकता है जो हमें उद्धार प्रदान कर सके (इब्रानियों 9:11-14)। नया नियम यीशु मसीह के बलिदान की उपलब्धियों की उद्घोषणा करता है कि उसकी धार्मिकता हमारे खाते में लिख दी गई और हमारे पापों के दण्ड को उसने क्रूस पर सह लिया और उसके लहू से हमारे अपराधों की क्षमा मिली (इफिसियों 1:7), उसने हमारा परमेश्वर से मेल-मिलाप करा दिया। नियमित रीति से बाइबल पढ़ने से हम यीशु मसीह को एवं क्रूस पर हमारे उद्धार के लिए किए गए कार्य को गहराई से समझते हैं।

परमेश्वर का वचन सुसमाचार द्वारा केवल उद्धार ही प्रदान नहीं कराता है, परन्तु यह परमेश्वर को जानने के लिए उत्साहित भी करता है।

  1. परमेश्वर को जानने के लिए।

परमेश्वर का वचन सुसमाचार द्वारा केवल उद्धार ही प्रदान नहीं कराता है, परन्तु यह परमेश्वर को जानने के लिए उत्साहित भी करता है। परमेश्वर ने इस्राएलियों को मिस्र देश से इसलिए छुड़ाया ताकि वे परमेश्वर यहोवा का भय मानें और उसको अपने सम्पूर्ण हृदय से प्रेम करें (व्यवस्थाविवरण 6:5, 10:12)।

इसी प्रकार देहधारी परमेश्वर, यीशु मसीह हमें पापों के दण्ड से छुड़ाकर अनन्त जीवन देता है और वह स्वयं ‘अनन्त जीवन’ की व्याख्या करता है कि “वे तुझ जो एक मात्र परमेश्वर है और यीशु मसीह को जानें जिसे तू ने भेजा है” (यूहन्ना 17:3)। 

यदि हम अनन्त जीवन का आनन्द लेना चाहते हैं तो हम परमेश्वर के वचन को पढ़ेंगे। क्योंकि उसका वचन ही उसके स्वयं का प्रकाशन है। उसका वचन उसके चरित्र, गुण एवं स्वभाव को प्रकट करता है। हम अनन्त जीवन में परमेश्वर को और अधिक जानते रहेंगे। परन्तु इसकी प्रक्रिया हमारे मसीही बनने के प्रथम दिन से ही आरम्भ हो जाती है। हम उसके वचन के द्वारा दिन-प्रतिदिन उसे जानते चले जाते हैं। मानो कि एक हीरा, जिसके हर एक पहलू की अलग चमक होती है। परमेश्वर को जानने के लिए हमारी यह प्रार्थना होनी चाहिए कि प्रभु जी हम वचन के द्वारा आपको और अधिक जान सकें और आपके जैसा बन सकें। 

परमेश्वर को जानने के साथ-साथ हम परमेश्वर के वचन को इसलिए भी पढ़ते हैं ताकि हम परीक्षाओं पर विजय पा सकें।

  1. परीक्षा पर विजय पाने के लिए।

परमेश्वर को जानने के साथ-साथ हम परमेश्वर के वचन को इसलिए भी पढ़ते हैं ताकि हम परीक्षाओं पर विजय पा सकें। मत्ती 4:1-12 में, शैतान के द्वारा यीशु मसीह की परीक्षा 40 दिन तक हुई। यीशु मसीह के उत्तर में ध्यान देने वाली बात यह है कि शैतान ने तीन बार यीशु मसीह को परीक्षा में विफल करना चाहा और तीनों बार यीशु मसीह ने अपने उत्तरों में कहा, “यह लिखा है… (मत्ती 4:4),  यह लिखा है… (मत्ती 4:7),  यह लिखा है… (मत्ती 4:10)।” यहाँ यीशु मसीह उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं कि हमें परीक्षाओं के मध्य वचन की चट्टान पर स्थिर रहना है। जब वासना की परीक्षा आती है तो हमें वचन से स्मरण करना है कि हम पवित्र होने के लिए बुलाए गए हैं (1 पतरस 1:15)। जब धन के लोभ की परीक्षा आती है तो हमें वचन से स्मरण करना है कि “सन्तोष सहित भक्ति वास्तव में महान कमाई है” (1 तीमुथियुस 6:6)। हमें प्रतिदिन बाइबल पढ़ने के द्वारा परमेश्वर के वचन को अपने हृदयों में अधिकाई से बसने देना है ताकि हम परीक्षाओं पर विजय पा सकें। मसीही होने के बाद भी बहुत बार हम परीक्षाओं में विफल होंगे और गिरेंगे। उस समय परमेश्वर का वचन ही  है जो हमारे आत्मिक जीवन में दीपक और उजियाला का काम करता है (भजन 119:105)।

  1. पवित्रता में बढ़ने के लिए।

परीक्षाओं पर विजय पाने के साथ-साथ बाइबल को पढ़ने का एक मुख्य पहलू यह भी है कि बाइबल हमें पवित्रता में बढ़ने के लिए सहायता करती है। परमेश्वर ने अपना वचन इसलिए दिया है कि हम उसकी इच्छा, चरित्र एवं गुणों को समझ सकें। परमेश्वर कहता है कि “तुम पवित्र बनो क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा पवित्र हूँ” (लैव्यव्यवस्था 19:2)। परमेश्वर ने इसी उद्देश्य से हमें मसीह में चुना तथा अपनी सन्तान बनाया है ताकि हम पवित्र बन सकें (इफिसियों 1:3, 1 पतरस 1:15)।

संसार, शरीर और शैतान हमारे सक्रिय शत्रु हैं। ये विश्वासी और परमेश्वर के सम्बन्ध को तोड़ना चाहते हैं। बहुत बार जीवन में ऐसा समय आएगा कि संसार कि चीज़ें हमें वचन नहीं पढ़ने देंगी। बहुत बार हमारा शरीर हमारा साथ नहीं देगा और हमारा मन ही हमसे कहेगा ‘चलो कोई बात नहीं कल बाइबल पढ़ लेना’। कई बार शैतान हमें पाप में गिरा कर सच्चे सुसमाचार की समझ को धुँधला करेगा और हमें सोचने पर बाध्य करेगा कि मैंने (वासना, झूठ, व्यभिचार का) पाप कर दिया, अब तो प्रभु जी मुझे क्षमा नहीं करेंगे। परन्तु ऐसे समय में परमेश्वर का वचन हमें पश्चाताप के लिए कायल करेगा। वचन के अनुसार हम तब ही उत्तर दें पाएंगे जब हम परमेश्वर के वचन को नियमित रीति से अपने मन में बसने देंगे। अतः हमारे लिए पवित्रता में बढ़ने के लिए बाइबल को पढ़ना अत्यधिक महत्वपूर्ण है। 

बाइबल पढ़ना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें अनन्त जीवन की आशा की निश्चितता में बढ़ने में सहायता करती है।

  1. अनन्त जीवन की आशा की निश्चयता में बढ़ने के लिए।

बाइबल पढ़ना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें अनन्त जीवन की आशा की निश्चितता में बढ़ने में सहायता करती है। परमेश्वर का वचन इसलिए लिखा गया है कि विश्वासी जानें कि अनन्त जीवन उनका है (1 यूहन्ना 5:13)। परमेश्वर ने हमें अपनी सन्तान बनाया है और वह चाहता है कि हम उसमें बने रहें। यीशु मसीह विश्वासयोग्य है उसने कहा कि मैं आऊँगा और तुम्हें अपने साथ लेकर जाऊँगा ताकि तुम सदैव मेरे साथ रहो और मेरे साथ संगति करो। परन्तु संसार एवं संसार की वस्तुएँ हमें संसार की सुख-शान्ति की ओर आकर्षित करती हैं। ये हमें संसार के क्षणिक सुख एवं आराम में फँसाती हैं। यदि हम प्रतिदिन वचन नहीं पढ़ेंगे तो हम इस संसार के झूठ पर विश्वास करने लगेंगे। इसलिए मसीह के कार्य एवं प्रतिज्ञाओं को स्मरण करने के लिए एवं अनन्त जीवन की आशा की निश्चयता को थामे रहने के लिए हम प्रतिदिन परमेश्वर का वचन पढ़ते हैं।

मसीह के कार्य एवं प्रतिज्ञाओं को स्मरण करने के लिए एवं अनन्त जीवन की आशा की निश्चयता को थामे रहने के लिए हम प्रतिदिन परमेश्वर का वचन पढ़ते हैं।

परमेश्वर का वचन ही हमें उत्साहित करता है कि हम उसके वचनों को पढ़ें और उस पर मनन करें। भजन 1:1-2 के अनुसार वचन को पढ़ने और उस पर मनन करने वाला व्यक्ति धन्य है। साथ ही साथ मत्ती 7:24-27 के अनुसार परमेश्वर के वचन को सुनने और उस पर चलने वाला व्यक्ति बुद्धिमान है। जो स्थिर रहेगा और कभी न डिगेगा। 

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